शुक्रवार, 16 मार्च 2012

नई वैश्विक अर्थव्‍यवस्‍था में भारत की स्थिति मजबूत हुई : आर्थिक समीक्षा 2011-12




भारत वर्षों से अधिक मुक्‍त अर्थव्‍यवस्‍था के रूप में उभरा है। आयात और निर्यात का कुल हिस्‍सा खाद्य का लगभग 50 प्रतिशत और अंतरप्रवाह तथा सकल घरेलू उत्‍पाद का 54 प्रतिशत है। भारत पूरे विश्‍व में उच्‍च विकास दर के साथ चौथी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था के रूप में उभरा है और प्रति व्‍यक्ति आय की दृष्टि से इसकी वैश्विक रैंकिंग में सुधार हुआ है। फिर भी यह एक तथ्‍य है कि भारत की प्रति व्‍यक्ति आय अब भी निम्‍न (वर्ष 2011 में 1527 अमरीकी डॉलर) है। इसका समाधान शायद बड़ी चुनौती है, इसके बावजूद भारत के पास घरेलू और विदेशी दोनों प्रकार के विभिन्‍न घटक है जिनसे भविष्‍य में विकास की अच्‍छी संभावनाएं नजर आती हैं।

एक अरब बीस करोड़ व्‍यक्तियों के साथ विश्‍व की जनसंख्‍या में भारत का लगभग छठा स्‍थान है। जनसंख्‍या वृद्धि दर में निरंतर कमी आई है। जनसांख्‍याकी का विकास में सकारात्‍मक योगदान होता है, लेकिन इसके लिए पर्याप्‍त मात्र में मानव पूंजी निर्माण की आवश्‍यकता है। भारत में मानव विकास सूचकांक की दृष्टि से सुधार हुआ है। आर्थिक निर्देशांक और शिक्षा एवं स्‍वास्‍थ्‍य संकेतकों की दृष्टि से यूएनडीपी का मानव विकास सूचकांक 1980 के 0.344 से बढ़कर 2011 में 0.547 हो गया। भारत का रैंक 1980 के 82 से बढ़कर 2011 में 72 हो गया।

भूमंडलीयकरण की प्रक्रिया में निर्यात के साथ-साथ आयात में भी वृद्धि देखी गई, जो 2010 में समग्र रूप में विश्‍व का 27.9 प्रतिशत हो गई, जबकि कुछ देशों में निर्यात पर ज्‍यादा निर्भरता देखी गई। सकल घरेलू उत्‍पाद में माल एवं सेवाओं के मामले में भारत का निर्यात अनुपात 1990 के 6.2 प्रतिशत से बढ़कर 2010 में 21.5 प्रतिशत हो गया है, फिर भी विश्‍व निर्यात में भारत का हिस्‍सा केवल 1.5 प्रतिशत है। भारत का निर्यात माल एवं सेवाओं के बीच समान रूप से संतुलित है। निर्यात की दिशा में परिवर्तन से पता चलता है कि भारत निर्यात हेतु पारम्‍परिक बाजारों से भिन्‍न स्‍थलों में वृद्धिकरण ला रहा है। तीव्र विकासशील अर्थव्‍यवस्‍थाओं में निर्यात बढ़ने की गुंजाइश है। 

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