बुधवार, 28 मार्च 2012

राष्‍ट्रीय अल्‍पसंख्‍यक आयोग - पांच धार्मिक अल्‍पसंख्‍यक समुदायों के आत्‍मविश्‍वास में वृद्धि




राष्‍ट्रीय अल्‍पसंख्‍यक आयोग की स्‍थापना एक संवैधानिक निकाय के रूप में 1993 में की गई थी। इसका उद्देश्‍य पांच धार्मिक अल्‍पसंख्‍यक समुदायों में आत्‍मविश्‍वास की इस भावना को सुदृढ़ बनाना था कि राज्‍य सरकारें उनके धार्मिक अधिकारों, स्‍वतंत्रता और देश के कानूनों का सम्‍मान करती हैं। यह आयोग संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों के कार्य और सुरक्षा का आकलन करने के लिए अध्‍ययन करवाती है। इन शोध कार्यों और अध्‍ययनों से केंद्र और राज्‍य दोनों सरकारों द्वारा अल्‍पसंख्‍यकों के विकास और प्रगति का अनुमान लगाया जाता है।

वर्ष 2011-12 के दौरान राष्‍ट्रीय अल्‍पसंख्‍यक आयोग ने तीन दंगाग्रस्‍त इलाकों का मौके पर जाकर जायजा लिया-

बिहार के अररिया जिले में फारबिसगंज जहां पुलिस द्वारा गोली चलाने से चार मुस्‍लिम मारे गए थे। आयोग ने सिफारिश की कि भीड़ पर गोलीबारी शुरू करने के जिम्मेदार पुलिसकर्मियों पर मुकदमा चलाया जाए और घटना में हताहत हुए लोगों को मुआवजा दिया जाए।

राजस्‍थान में भरतपुर जहां पुलिस और मेव और गुर्जर लोगों में झड़प हुई थी जिसके कारण 10 लोग मारे गए थे। इस आयोग ने अपने दो सदस्‍यों को मौके पर जाकर जांच के लिए भेजा जिसमें श्रीमती सैयदा इमाम और श्री के.एन. दारूवाला शामिल थे। आयोग ने सिफारिश की कि जिला अधिकारियों और खासतौर से पुलिस को इस विषय में संवेदनशील बनाने के उपाय किये जाएं। जिला मजिस्‍ट्रेट, जिला पुलिस प्रमुख और एएसपी को आयोग की सिफारिश पर निलम्बित कर दिया गया।

उत्‍तरकाशी में रूद्रपुर जहां दो ग्रुपों के बीच झड़प के परिणामस्‍वरूप चार लोग मारे गए और आगजनी और लूट में बड़े पैमाने पर सार्वजनिक और निजी सम्‍पति का नुकसान हुआ था। आयोग की श्री के.एन. दारूवाला के नेतृत्‍व में टीम ने मौके पर जाकर प्रभावित परिवारों से भेंट की। इस मामले में जो सिफ़ारिशें की गईं उनमें मोहल्‍ला  शांति समितियों को सक्रिय बनाना, पुलिसकर्मियों को संवेदनशील करना और जिन पुलिस कार्मिकों ने पूर्वाग्रहपूर्ण भूमिका निभाई, उनका तबादला करना शामिल था।

बड़े पैमाने पर मुस्‍लिम युवकों की गिरफ्तारी और उन्‍हें बिना साक्ष्‍य के लम्‍बे समय तक जेलों में बंद रखना आयोग के लिए एक चिंता की बात थी। आयोग इस बात से भी उद्वेलित था कि सालों तक और कभी-कभी दशकों तक मुक़दमे की सुनवाई चलने के बाद पुलिस आरोप साबित नहीं कर पाई। रिहा किये गए युवा पूरी तरह पुनर्वासित नहीं किये गए और कुछ मामलों में तो बरी होने के बाद उन्‍हें सामान्‍य जीवन भी नहीं बिताने दिया और उन्‍हें समाज के प्रति शक की नजर से देखा गया।

इस संदर्भ में आयोग ने राज्यों और केंद्र सरकार से बात की और मुक़दमे की सुनवाई तेजी से पूरा करने और मुक़दमों के अभियोजन पक्ष को स्‍वतंत्र बनाने की जरूरत पर जोर दिया गया ताकि अभियोजन पक्ष पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारयों पर अंगुली उठा सके। आयोग ने आंध्र प्रदेश सरकार के साथ संपर्क किया और उन मुसलमान युवकों के बारे में बात की जिन्‍हें उच्‍च न्‍यायालय ने मक्‍का-मस्जिद विस्‍फोट मामले में बरी कर दिया था। राज्‍य सरकार ने माकूल जवाब दिया और 20 मुस्‍लिम युवकों को, जो अदालत द्वारा बरी कर दिये गए थे, 70 लाख रूपये की सहायता दी।

इस आयोग ने ईसाईयों की जिन समस्‍याओं को सुलझाने के प्रयास किए उनमें ईसाई संगठनों और चर्चों की गिन‍ती के समय ईसाई परिवारों के प्रोफाइल बनाने के भोपाल पुलिस के आदेश, मांडला के खुंभ मेले में पिछले साल ईसाइयों के खिलाफ किया गया दुष्‍प्रचार, और कर्नाटक तथा मध्‍यप्रदेश में र्इसाइयों को परेशान करने की घटनाएं और संविधान द्वारा  गांरटीशुदा उनके अधिकारों - घर में ही प्रार्थना सभाएं करना शामिल हैं। बंगलौर में जिन पुलिसकर्मियों ने एक ब्रदर को सरेआम मुकदमा दायर न करके परेशान किया था, और 3 ईसाई पुजारियों को मध्‍यप्रदेश में एक हिन्‍दू के अंतिम संस्‍कार की घटना के खिलाफ फर्जी मामला दर्ज किया था ये सभी मामले आयोग के हस्‍तक्षेप के बाद सुलझा लिए गए। बंगलौर में पुलिस कर्मी को निलम्बित कर दिया गया और जांच चल रही है। मध्‍यप्रदेश पुलिस द्वारा दर्ज किए गए फर्जी मामले वापस लिए जा चुके है।

      साल के दौरान आयोग ने उन बौद्धों की भावनाएं शांत करने की कोशिश कीं जो करमापा के बारे में मीडिया में खबरें छपने से उतेजित हो गए थे। आयोग ने यह मामला सरकार और ब्रॉडकास्‍ट कौंसिल के साथ उठाया ताकि मीडिया को ऐसे मामलों में संवेदनशील बनाया जा सके। बौद्ध सदस्‍य, श्रीमती स्‍पाल्‍जेस अंगमो ने भी यह मामला हाथ में लिया और बौद्धों द्वारा पवित्र मानी जाने वाली नदी रोथुंगचू पर कई पनबिजली परियोजनाएं सिक्किम में बनाये जाने के बारे में सिक्किम सरकार से बातचीत की। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अब ये दोनों परियोजनाएं रद्द की जा चुकी हैं और तीसरी की समीक्षा की जा रही है।

आयोग ने हरियाणा के रेवाड़ी जिले में 1984 में छिल्‍लर गांव में सिखों के मारे जाने की कथित घटना का मीडिया में खबरें आने पर खुद संज्ञान लिया और घटना के शिकार लोगों के पुनर्वास के बारे में हरियाणा के मुख्‍यमंत्री से बात की। हरियाणा के मुख्‍यमंत्री ने इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के एक सेवानिवृत्‍त न्‍यायाधीश के नेतृत्‍व में पहले ही जांच आयोग नियुक्‍त कर दिया था। सिखों से संब‍ंधित अन्‍य मामले भी उठाये गए जिनमें हरियाणा में अलग से गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी के संविधान का मामला शामिल था। उठाये गए अन्‍य विषयों में पंजाबी को दूसरी भाषा के रूप में लागू करना और आकाशवाणी तथा दूरदर्शन केंद्र से पंजाबी कार्यक्रमों की शुरूआत शामिल है।

पारसियों की घटती जनसंख्‍या और उनकी सहायता के लिए आरक्षण जैसे मामले भी राज्‍य और केंद्र सरकारों के साथ उठाए गए। पारसी समुदाय के प्रतिनिधि ने भी इस संबंध  में वित्‍त मंत्री से बात की और उन मुश्किलों पर चर्चा की जो प्रत्‍यक्ष कर संहिता वर्तमान स्‍वरूप में लागू किए जाने पर सामने आ सकती हैं। वर्तमान वित्‍त वर्ष में फरवरी 2012 तक आयोग में कुल 20 मामलों की सुनवाई की जा चुकी है। आयोग को कुल 2336 शिकायतें मिलीं जिनमें से 588 निपटायी जा चुकी है और बाकी पर प्रक्रिया जारी है।

वर्ष के दौरान हाल की मंदी और भारतीय अर्थ-व्‍यवस्‍था में उदारीकरण का लघु, कुटीर और हस्‍तशिल्‍प उद्योगों में काम करने वालों और खासतौर से मुस्‍लिम  अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के कामगारों पर प्रभाव और उनके उपचार संबंधी उपाय तथा अल्‍पसंख्‍यक अधिकारों के बारे में कानूनों और कानूनी नजीरों के संकलन जैसे विषयों पर दो महत्‍वपूर्ण शोध  अध्‍ययन करवाये गए।(पसूका)

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